Wednesday, September 4, 2024

राष्ट्रीय शिक्षक दिवस विशेष_ इस माह के विशिष्ट व्यक्तितव् डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्ण

  

आजाद भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति के तौर पर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है. वे दर्शनशास्त्र का भी बहुत ज्ञान रखते थे, उन्होंने भारतीय दर्शनशास्त्र में पश्चिमी सोच की शुरुवात की थी. राधाकृष्णन प्रसिध्य शिक्षक भी थे, यही वजह है, उनकी याद में हर वर्ष 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है|

जीवन परिचय बिंदु राधाकृष्णन जीवन परिचय
पूरा नामडॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन
धर्महिन्दू
जन्म5 सितम्बर 1888
जन्म स्थानतिरुमनी गाँव, मद्रास
माता-पितासिताम्मा, सर्वपल्ली विरास्वामी
विवाहसिवाकमु (1904)
बच्चे5 बेटी, 1 बेटा

डॉ राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को तमिलनाडु के छोटे से गांव तिरुमनी में ब्राह्मण परिवार में हुआ था|इनके पिता का नाम सर्वपल्ली विरास्वामी था, वे गरीब जरुर थे किंतु विद्वान ब्राम्हण भी थे| इनके पिता के ऊपर पुरे परिवार की जिम्मदारी थी, इस कारण राधाकृष्णन को बचपन से ही ज्यादा सुख सुविधा नहीं मिली.  

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी की शिक्षा 

डॉ राधाकृष्णन का बचपन तिरुमनी गांव में ही व्यतीत हुआ. वहीं से इन्होंने अपनी शिक्षा की प्रारंभ की. आगे की शिक्षा के लिए इनके पिता जी ने क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरुपति में दाखिला करा दिया. जहां वे 1896 से 1900 तक रहे. सन 1900 में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने वेल्लूर के कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की. तत्पश्चात मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास से अपनी आगे की शिक्षा पूरी की. वह शुरू से ही एक मेंधावी छात्र थे. इन्होंने 1906 में दर्शन शास्त्र में M.A किया था. राधाकृष्णन जी को अपने पुरे जीवन शिक्षा के क्षेत्र में स्कालरशिप मिलती रही|

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के करियर की शुरुवात –

1909 में राधाकृष्णन जी को मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र का अध्यापक बना दिया गया| सन 1916 में मद्रास रजिडेसी कालेज में ये दर्शन शास्त्र के सहायक प्राध्यापक बने. 1918 मैसूर यूनिवर्सिटी के द्वारा उन्हें दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में चुना गया| तत्पश्चात वे इंग्लैंड के oxford university में भारतीय दर्शन शास्त्र के शिक्षक बन गए. शिक्षा को डॉ राधाकृष्णन पहला महत्व देते थे. यही कारण रहा कि वो इतने ज्ञानी विद्वान् रहे. शिक्षा के प्रति रुझान ने उन्हें एक मजबूत व्यक्तित्व प्रदान किया था. हमेशा कुछ नया सीखना पढने के लिए उतारू रहते थे. जिस कालेज से इन्होंने M.A किया था वही का इन्हें उपकुलपति बना दिया गया. किन्तु डॉ राधाकृष्णन ने एक वर्ष के अंदर ही इसे छोड़ कर बनारस विश्वविद्यालय में उपकुलपति बन गए. इसी दौरान वे दर्शनशास्त्र पर बहुत सी पुस्तकें भी लिखा करते थे|

डॉ राधाकृष्णन, विवेकानंद और वीर सावरकर को अपना आदर्श मानते थे. इनके बारे में इन्होंने गहन अध्ययन कार रखा था. डॉ राधाकृष्णन अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से समूचे विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराने का प्रयास किया. डॉ.राधाकृष्णन बहुआयामी प्रतिभा के धनी होने के साथ ही देश की संस्कृति को प्यार करने वाले व्यक्ति भी थे|

डॉ राधाकृष्णन का राजनीती में आगमन –

जब भारत को स्वतंत्रता मिली उस समय जवाहरलाल नेहरू ने राधाकृष्णन से यह आग्रह किया, कि वह विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करें.  नेहरूजी की बात को स्वीकारते हुए डॉ.राधाकृष्णन ने 1947 से 1949 तक संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य के रूप में कार्य किया. संसद में सभी लोग उनके कार्य और व्यव्हार की बेहद प्रंशसा करते थे. अपने सफल अकादमिक कैरियर के बाद उन्होंने राजनीतिक में अपना कदम रखा|                                                                                                                                         13 मई 1952 से 13 मई 1962 तक वे देश के उपराष्ट्रपति रहे . 13 मई 1962 को ही वे भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए|

डॉ.राधाकृष्णन को मिले सम्मान व अवार्ड   

  • शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए डॉ. राधाकृष्णन को सन 1954 में सर्वोच्च अलंकरण “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया.
  • 1962 से राधाकृष्णन जी के सम्मान में उनके जन्म दिवस 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई|
  • सन 1962 में डॉ. राधाकृष्णन को “ब्रिटिश एकेडमी” का सदस्य बनाया गया.
  • पोप जॉन पाल ने इनको “गोल्डन स्पर” भेट किया.
  • इंग्लैंड सरकार द्वारा इनको “आर्डर ऑफ़ मेंरिट” का सम्मान प्राप्त हुआ.

डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन शास्त्र एवं धर्म के उपर अनेक किताबे लिखी जैसे “गौतम बुद्धा: जीवन और दर्शन” , “धर्म और समाज”, “भारत और विश्व” आदि. वे अक्सर किताबे अंग्रेज़ी में लिखते थे|

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मृत्यु  

17 अप्रैल 1975 को एक लम्बी बीमारी के बाद डॉ राधाकृष्णन का निधन हो गया. शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान हमेंशा याद किया जाता है. इसलिए 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाकर डॉ.राधाकृष्णन के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है. इस दिन देश के विख्यात और उत्कृष्ट शिक्षकों को उनके योगदान के लिए पुरुस्कार प्रदान किए जाते हैं. राधाकृष्णन को मरणोपरांत 1975 में अमेंरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो कि धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है. इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले यह प्रथम गैर-ईसाई सम्प्रदाय के व्यक्ति थे|

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनमोल वचन  

Sarvepalli radhakrishnan quotes

SR quotes

 




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Wednesday, August 28, 2024

National Sports Day 29 August 2024- A Short Reading about the Day

 

National Sports Day : History, Significance and a Tribute to Major Dhyan Chand

National Sports Day : It is observed on 29 August every year to commemorate the birthday of Indian hockey legend Major Dhyan Chand. Born on 29 August 1905 in present-day Prayagraj, UP, Major Dhyan Chand was the captain of the Gold medal-winning Indian hockey team at the Berlin Olympics in 1936.
National Sports Day is celebrated on 29 August every year to commemorate the birthday of Indian hockey legend Major Dhyan Chand.


Major Dhyan Chand

Widely known as 'Wizard of Hockey', the greatest hockey player of India, Major Dhyan Chand Singh, was born on 29 August 1905 in present-day Praygraj, UP. After getting a basic education, Dhyan Chand joined the Indian army as a soldier in 1922.
Major Dhyan Chand was a true sportsperson and was motivated by Subedar Major Tiwari, who was himself a sports lover, to play Hockey. Dhyan Chand started playing hockey under his supervision.
Due to his outstanding performance in Hockey, Dhyan Chand was appointed as 'Lance Naik' in 1927 and was promoted to Nayak in 1932, and Subedar in 1936. The same year he Captained the Indian hockey team. He went on to become Lieutenant, Captain and was eventually promoted to Major.

Major Dhyan Chand's performance

Major Dhyan Chand was a great hockey player. If a ball stuck in his stick, it scored a goal. This was the reason that once his stick was broken during a match to check whether the stick has any magnet or something else inside it or not.
Major Dhyan Chand, was part of the three-time Olympic gold medalist Indian Hockey Team.  At the Berlin Olympic Games of 1936, Dhyan Chand was elected the captain of the Indian Hockey team.
Major Dhyan Chand had scored more than 400 international goals in his career from 1926 to 1948 while scoring nearly 1,000 goals In his entire career. 
In a bid to pay tribute to such a legendary player, the Government of India decided to celebrate his birthday as the National Sports Day in 2012.
Before this recognition, he was awarded the Padma Bhushan Award by the Government of India in 1956, the third-largest civilian honour in India. 

QUESTIONNAIRE UNDER AWARENESS CAMPAIGN DURING ANTI DENGUE MONTH (1-31 JULY 2026)

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